बदलो इन्हें ये शैतानों के डेरे हैं | राय
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बदलो इन्हें ये शैतानों के डेरे हैं | राय

Published on :27 Sep,2017 By :- UNT News Desk



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:तड़पती जान का एक मनहूस चेहरे के सामने बैठना मजबूरी, भद्दी राइटिंग में लिखे चार शब्द और बिना चेहरा देखे सिर्फ ये कहना कि सौदे के बाद दिखाना जरूर।.. ..ये जान बचाएगा या लेगा--
--भगवान के रूप को शैतान बनते देर नहीं लगी। कुछ भले लोगों को छोड़ दिया जाए तो धरती के भगवान जान के दुश्मन बन गए हैं। डाक्टर तो बतों में ही मरीज की आधी बीमारी ठीक कर देते थे, लेकिन अब इनके चेहरे से सहानुभूति तक नहीं झलकती। पेशा महंगा और निर्मम इसलिए बन गया कि इसमें बेतहाशा कमाई के रास्ते खुले हैं। इनके लिए हर मरीज धन की पोटली है।
...महंगी फीस, हर दवा से कमीशन, कंपनियों से नगद व महंगे उपहार सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों के डाक्टरों का चोखा धंधा है। इसके बाद भी वह किसी मरीज का सही इलाज करें इसकी कोई गारंटी नहीं। बहुत कम डाक्टर ही इस पेशे को बदनाम होने से बचाने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन इनको कोई टिकने नहीं देगा...
---छोटे-बड़े डिब्बों से ठसाठस भरे मेडिकल स्टोरों में दवाएं तो गिनती की होती हैं महाराज। डिब्बों में तो कंपनियों के माल भरे होते हैं।
..... अमूमन बुखार कम करने के लिए पैरासिटामोल या कुछ परिस्थितियों में निमोशुलाइड ही दी जाती है। लेकिन इस दवा को हजारों कंपनियां बनाती हैं। डाक्टर से जिस कंपनी का सौदा तय हो गया, वह उसी कंपनी की दवा लिखेगा। यही हाल सभी बीमारियों का है। गंभीर बीमारी किसी को पकड़ ले तो जान तो जाएगी ही परिवार का बर्बाद होना भी तय है। यही कारण है कि लोग बीमारी गंभीर होने तक झोलाछाप डाक्टरों से ही इलाज कराते रहते हैं। बड़े डाक्टर के पास जाना माने पहले दिन से बर्बादी समझी जाती है। अस्पतालों में अच्छे डाक्टरों की व्यवस्था होती तो भला झोलाछापों की दुकानें जबरन बंद कराने की जरूरत ही क्यों पड़ती। निजी नर्सिंग होम सबसे बड़े लूट का अड्डा बन चुके हैं। इतना ही नहीं छोटी सी बीमारी में भी तत्काल राहत देने वाली जीवन रक्षक दवाओं का इस्मेमाल किया जाता है, जो बेहद खतरनाक मानी जाती हैं।
---यदि सरकारें जनता की होतीं तो अच्छा भला डाक्टरी पेशा आज इस कदर निर्मम नहीं होता। दवा बनाने से लेकर इलाज तक सभी कुछ सरकार के नियंत्रण में हो तो इस पेशे को उच्चतर स्थिति तक पहुंचाया जा सकता है। एक दवा बनाने के लिए हजार कंपनियों की जरूरत नहीं और हजारों दवा बनाने के लिए लाख कंपनियों की जरूरत भी नहीं। सरकार दवा उद्योग चलाए तो हर मरीज को बेहतर दवा और इलाज मिल सकता है। मजे की बात ये कि दवाओं के लिए अब अनुसंधान भी लगभग बंद हो चुके हैं। हर माल बाहर से लाकर यहां बेचा जा रहा है।
( Chandrashekhar Joshi )





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